Crime Patrol Dastak: "Iss raat ki subah nahi" Story of Gauri (Crime Patrol : Episode 130 - 14th July 2012)


यह कहानी एक ऐसी लड़की की है, जिसका इस दुनिया में कोई नहीं है. पिछले पांच सालों से वह डिस्ट्रिक्ट जेल में उस अपराध की सजा काट रही, जो शायद उसने किया ही नहीं. उन्नीस साल की उम्र में जब और लड़कियां हसीन सपने बुन रही होती हैं, तो जेल की अंधेरी कोठरी में वह आंसुओं में डूबी है. उसकी खता सिर्फ इतनी थी कि वह गरीब थी.

गरीबी का कहर, छूटता रहा अपनों का साथ
सीमा के होश संभालते ही मुसीबतों का पहाड़ टूटने लगा. मां-बाप और एक छोटे भाई के साथ उसकी फैमिली किराए के मकान में रहती थी. उस समय उसकी उम्र लगभग 9 साल थी. घर की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी. एक दिन मकान मालिक ने सीमा की फैमिली को अचानक रात में घर से निकाल दिया. पूरा परिवार सड़क पर आ गया. मगर इससे बड़ी मुसीबत तब आई, जब उसके पिता परिवार को छोड़कर कहीं चले गए. मां ने किसी तरह कुछ दिन तक सीमा और उसके भाई का पालन-पोषण किया. अभी दिन सुधरे ही थे कि सीमा पर एक और पहाड़ टूट पड़ा, जब एक दिन उसकी मां उसके छोटे भाई को लेकर अचानक गायब हो गई. मां की तलाश में सीमा दर-दर भटकती रही. एक ओर मां का दुख था तो दूसरी ओर भूख सता रही थी.

मसीहा बनकर आया टैक्सी ड्राइवर
मां-बाप और भाई से बिछुडऩे के बाद सीमा बिल्कुल अकेले पड़ गई थी. कई दिनों तक सड़कों पर भूखे-नंगे घूमते रहने के बाद सीमा को टैक्सी ड्राइवर के रूप में एक मसीहा मिला. उसने पूरी कहानी सुनने के बाद सीमा को अपने घर में शरण दी. कुछ दिन घर में रखने के बाद उस टैक्सी ड्राइवर ने सीमा को अपने एक रिलेटिव के घर छोड़ दिया. वहां सीमा मेड के रूप में रहने लगी. सीमा भी किस्मत के इस फैसले से खुश थी कि कम से कम थोड़े काम के बदले घर और खाना तो मिलेगा.

पांच साल बाद फिर टूटा पहाड़
सीमा ट्रैक्सी ड्राइवर के रिलेटिव के घर मेड के रूप में आराम से रह रही थी. 5 साल बीत गए, मगर सीमा की लाइफ में किसी तरह की कोई प्रॉब्लम नहीं हुई. मगर शायद किस्मत को यह मंजूर नहीं था. जिस घर में सीमा रह रही थी, अचानक उसका मालकिन से विवाद हो गया. बात इतनी बढ़ गई कि मालकिन ने सीमा के खिलाफ चोरी की रिपोर्ट दर्ज करा दी. घटना की असलियत क्या थी, यह कहना तो मुश्किल होगा, मगर सीमा को चोरी के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. तब वह नाबालिग थी. सीमा को पुलिस ने मिर्जापुर जेल भेज दिया.

मामला अभी ट्रायल में
गोरखपुर डिस्ट्रिक्ट जेल में बंद सीमा के अनुसार, बालिग होने पर ही सीमा को गोरखपुर जेल भेज दिया गया. सीमा अब तक लगभग 5 साल की 'सजाÓ काट चुकी है. मगर उसका मामला अभी ट्रायल पर है. वह जेल से कब तक छूटेगी यह कहना मुश्किल होगा, क्योंकि सीमा की न तो कोई जमानत कराने वाला है और न ही केस की जल्द सुनवाई कराने वाला. मगर सीमा की इस कहानी ने यह तय कर दिया कि जिसका कोई नहीं होता, उसे सिर्फ मुसीबतों का ही सामना करना पड़ता है. जेलर ने बताया कि सीमा चोरी के आरोप में बंद है. जब तक उसे सजा सुनाई नहीं जाती, तब तक वह यही रहेगी. क्योंकि उसकी जमानत कराने वाला कोई नहीं है.
 
पांच साल से जेल में बंद सीमा सलाखों के बाहर आएगी. सीमा की दुखभरी कहानी के साथ हमने कहा था कि इस रात की सुबह नहीं. ये भी कि जिसका कोई नहीं, उसका खुदा भी नहीं... लेकिन माफ कीजिएगा, हम गलत थे. इस रात की सुबह है. गोरखपुर बड़े दिल वालों का शहर है. जिसका कोई नहीं, उसके लिए यहां कई हाथ बढ़ जाते हैं.

सीमा का भी परिवार था. मां थी, बाप था, भाई था. लेकिन जिंदगी जब इम्तिहान लेती है, तो रिश्ते बेमानी हो जाते है. अपने कैसे दामन छोड़ जाते है, सीमा से पूछिए. नौ साल की थी, मकान मालिक ने परिवार को घर से निकाल दिया. पूरा परिवार सड़क पर आ गया. बाप को हालात काबू में आते न लगे, तो वो भगोड़ा हो गया. फुटपाथ पर बचे सीमा, उसकी मां और भाई. फिर मां भाई को लेकर गायब हो गई. बेटी बोझ होती है, उसे फुटपाथ के भरोसे छोड़ गई. मुकद्दर की ठोकरें खाती सीमा को एक घर में बतौर मेड आसरा मिल गया. यहां मामूली विवाद में उस पर चोरी का इलजाम लगा. 15 साल की उम्र में सीमा सलाखों के पीछे पहुंच गई. मुकदमा ट्रायल पर है. पांच साल जेल में गुजार चुकी सीमा को अपने जुर्म साबित होने पर भी इतनी सजा नहीं मिलेगी. सीमा इसलिए जेल में है, क्योंकि कोई जमानत कराने वाला नहीं था.
पर अब है

वो गुजरी बात है कि सीमा का कोई नहीं था. सीमा की ये कहानी आई नेक्स्ट के जरिये गोरखपुर शहर के सामने है. सीमा एक सवाल के तौर पर जब सामने आई, तो कई हाथ बढ़े. आई नेक्स्ट की ये पहल है, ये जिद है कि सीमा भी शहर की बाकी लड़कियों की तरह जिंदगी जिये. इस पहल में आई नेक्स्ट के साथ हाथ मिलाया वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र धर दूबे ने. बतौर वकील रोज इंसाफ की जंग लडऩे वाले दूबे खुदाई खिदमतगार के तौर पर सीमा को जेल से बाहर निकालने के लिए आगे आए है. इस बाबत सोमवार को दूबे पहले जेल अधीक्षक एस.के.शर्मा से मिले, फिर सीमा से मुलाकात की. सीमा हैरान थी. पांच साल में पहली बार कोई उससे मिलने आया था. आज दूबे ने इस मामले में संबंधित न्यायाधीश से मुलाकात की. चार तारीख को पेशी पर दूबे सीमा की जमानत अर्जी लगाएंगे.

बार भी साथ
गोरखपुर बार एसोसिएशन भी इस नेक काम में आई नेक्स्ट के साथ आगे आई है. बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश दूबे ने वादा किया है कि बार पूरी तरह से इस काम में साथ है. बार सीमा को जेल से बाहर लाने की इस मुहिम में हर संभव मदद करेगी. उन्होंने भी इस सिलसिले में बार का प्रतिनिधिमंडल जेल भेजने और जमानत के लिए उपलब्ध कराने का इरादा जाहिर किया है.
 
 
 
बिना जुर्म अपने जीवन के पांच सुनहरे साल जेल की कोठरी में खाक कर चुकी सीमा का अब एक परिवार बांहें पसारे इंतजार कर रहा है. वकील उसकी रिहाई के कागजात तैयार कर रहे है. जेलर से लेकर जिलाधिकारी तक इस बात के लिए फिक्रमंद है कि सीमा आजाद हो, आबाद हो. आई नेक्स्ट ने एक पहल की, तो लोग साथ आते गए कारवां बनता गया.27 मार्च
सुबह दस बजे
आई नेक्स्ट ऑफिस 

संपादक विकास वर्मा के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र दुबे मौजूद थे. वीरेंद्र दुबे सीमा से मिल चुके थे, संबंधित मामले के जज से बात कर चुके थे. फिक्र सिर्फ इतनी नहीं थी कि सीमा जेल से बाहर आ जाए. चिंता ये भी थी कि सीमा बाहर आकर कहां रहेगी, क्या करेगी? आई नेक्स्ट के एक और रीडर एसएन शुक्ला भी जेल में सीमा से मुलाकात की नाकाम कोशिश के बाद पत्नी के साथ आई नेक्स्ट के ऑफिस पहुंचे. एसएसबी (सीमा सुरक्षा बल) ऑफिस में कैंटीन चलाने वाले एसएन शुक्ला की पत्नी की आंखों में उम्मीदें थीं. वो सीमा से बिना मिले ही उसे बेटी मान चुकी थीं. इस उम्मीद में कि सीमा नवरात्र का व्रत रखे होगी, वह व्रत का सामान घर से लेकर चली थीं.

साढ़े ग्यारह बजे
जिला जेल
आई नेक्स्ट टीम के साथ जब वीरेंद्र दुबे और एसएन शुक्ला का परिवार जेल पहुंचा, तो वरिष्ठ जेल अधीक्षक एसके शर्मा मुंतजिर थे. जेल की चाहरदीवारी की निगेहबानी करते जिंदगी काट चुके एसके शर्मा की आंखें अपराधी और मजलूम के फर्क को पहचानती हैैं. उनकी आंखें बहुत पहले पहचान चुकी थी कि सीमा को जेल में नहीं होना चाहिए था. उन्होंने आई नेक्स्ट टीम और बाकी मेहमानों का खुले दिल से स्वागत किया. कागजी औपचारिकताओं के बाद सीमा से मुलाकात का रास्ता साफ हुआ.

वो एक घंटा
स्काई ब्लू सूट में पोनी टेल बांधे पांच फीट दो इंच लंबी वो लड़की मुलाकात की आवाज पर हैरान होती पहुंची. सकुचाए, सहमे से उसके चेहरे पर ये भाव साफ नजर आते थे कि मुझसे मिलने कौन आया? इतने साल में उससे मिलने कोई आया नहीं था. फिर आज अचानक, कौन? क्यों? जिसने सलाखों को अपना मुकद्दर मान लिया, जिसने सोच लिया कि शायद ही वो कभी आजादी की सांस लेगी, उसे कैसे ये यकीन आता कि जिन लोगों को वो जानती नहीं, कभी देखा नहीं, वो उसके लिए फिक्रमंद होंगे. जिसके मां-बाप फुटपाथ पर छोड़ गए, उसे कैसे यकीन आता कि गैर अपने बनकर आ गए हैैं. जब किस्मत ने हर कदम पर दगा दी, तो सीमा के सामने सवाल था कि वो कैसे विश्वास कर ले? आई नेक्स्ट के संपादक विकास वर्मा से तकरीबन आधे घंटे की बातचीत के बाद सीमा को यकीन आया कि वो सही लोगों के बीच है. सीमा के दिल का डर निकला, तो वो सब से खुलकर मिली. सालों बाद उसके चेहरे पर सहज मुस्कान खिली थी. जब श्रीमती सुमन शुक्ला ने उसे गले लगाया, तो वो नन्ही बच्ची की तरह उनके पहलू में सिमट गई. सालों से उसे जेल में देख रहे जेल कर्मचारियों की पलकें भीग गईं. सीमा सुबक पड़ी, सुमन रोने लगी. मर्द दिल भारी होने के बाद इसे अनदेखा करने का बहाना बनाकर आपसी बातचीत में मशगूल हो गए. वरिष्ठ जेल अधीक्षक ने इस बाबत सीमा से मिलने पहुंचे दल-बल को बताया कि इस बाबत वो जिलाधिकारी को रिपोर्ट भेज रहे हैैं. उनकी परमिशन पर सीमा को गार्जियनशिप में सौंपा जा सकता है.

शाम सात बजे
जिलाधिकारी आवास
जिलाधिकारी संजय कुमार से मिलने का समय तय हुआ. जिलाधिकारी बहुत पॉजिटिव एटिट्यूड के साथ मिले. जिले के सबसे बड़े नौकरशाह होने का तकाजा है कि इस तरह की पॉजिटिव पहल को वो आगे बढ़ाएं. उन्होंने तपाक से कहा कि ऐसा तो होना ही चाहिए. उन्होंने तुरंत वरिष्ठ जेल अधीक्षक से बात की. वरिष्ठ जेल अधीक्षक की रिपोर्ट से मुतमईन होने के बाद उन्होंने सीमा की रिहाई से संबंधित एप्लीकेशन पर अपर जिलाधिकारी नगर को इसे अंजाम दिलाने की जिम्मेदारी सौंप दी. न सिर्फ सौंपी, खुद एडीएम सिटी से बात की. एडीएम सिटी ने आई नेक्स्ट को बताया कि कल सीमा की रिहाई की औपचारिकता पूरी हो जाएंगी. खुदा करे, ऐसा ही हो. अब सलाखों के पीछे सीमा का एक-एक दिन मुहाल है. उसे पता है कि जिंदगी बाहर उसे आवाज लगा रही है. उम्मीद है कि नौकरशाही एक सपने को लालफीते का शिकार नहीं बनाएगी.

धन्यवाद: